सोनभद्र : खुलते ही प्राइवेट स्कूलों का वसूली अभियान जारी। फीस बढ़ोत्तरी पर नहीं लगा लगाम, ड्रेस बदलकर हो रही वसूली। कपड़े, किताब हर समान तय दुकान पर ही उपलब्ध। गत एक दशक के अंदर जिले में प्राइवेट स्कूलों की आई बाढ़

जागरण संवाददाता, सोनभद्र : जुलाई में स्कूलों के खुलने के साथ ही प्रवेश को लेकर प्रक्रिया शुरू हो गई है। आवेदन फार्म मिल रहे हैं तो कहीं-कहीं पर तो प्रवेश प्रक्रिया समाप्त होने की तरफ है। बावजूद इसके अभी तक किसी भी प्राइवेट स्कूल में फीस कमी को लेकर सरकारों के बड़े-बड़े दावे फेल ही साबित हो रहे हैं। अभिभावकों को इस बात का मलाल है कि सूबे में सत्ता परिवर्तन होने के बाद भी निजी स्कूलों की महंगी फीस पर कोई ठोस रणनीति अभी तक जमीन पर नहीं उतर पाई। बातें तो जरूर बड़ी-बड़ी की जा रही है। अभिभावकों ने कहा कि स्कूल प्रबंधन का फीस किस दर से बढ़ेगा, इसकी कोई नीति स्कूलों में है ही नहीं। जिसके कारण उन्हे अपने बच्चों के प्रवेश के लिए पैसों का इंतजाम करना पड़ रहा है। अगर यह कहें कि अभिभावकों का बजट गड़बड़ा गया है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी।1प्राइवेट स्कूलों की आई बाढ़ 1जनपद मुख्यालय की ही बात करें तो गत एक दशक के दौरान ही यहां पर निजी स्कूलों की संख्या दिनों0दिन बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। नगर से लेकर तहसील, कस्बों और गांवों में शानदार इमारतें निजी स्कूलों की दिखाई दे रही हैं। प्रवेश के लिए बिकने वाला आवेदन फार्म 500-500 रुपये में दिया जा रहा है। प्रवेश शुल्क एक बच्चे पर 6-10 हजार रुपये के बीच है। हर वर्ष नए शिक्षण सत्र में यह रकम बढ़ जाती है। नर्सरी, लोवर केजी, फिर अपर केजी उसके बाद प्रथम कक्षा में प्रवेश की सीढ़ी बनाई गई है। 1 कई ऐसे निजी स्कूल हैं जो नर्सरी में भी प्रवेश के लिए साक्षात्कार की प्रक्रिया लागू किए हैं। अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूलों पर भी ऐसी नीति तय होनी चाहिए कि प्रवेश शुल्क और फीस का मानक निर्धारित हो। बताया कि निजी स्कूलों का रूख धीरे-धीरे अब व्यापारिक हो गया है। बच्चों को शिक्षा देकर सभ्य नागरिक बनाने के बजाय अब केवल आय बढ़ाने का स्त्रोत बन गया है। सरकार बदलने के बाद भी अभिभावकों को कोई राहत नहीं मिल पाई है। मांग किया कि जैसे सरकारी स्कूलों में फीस दर निर्धारित है ऐसा निजी स्कूलों में भी हो। निजी स्कूलों में भी आडिट कराने के प्रबंध सरकार की ओर सुनिश्चित किया जाए जिससे यह पता चल सके कि यह स्कूल ज्ञान बांटते हैं या पैसा बटोरते हैं। फीस किस दर बढ़ेगी, इसकी कोई नीति स्कूलों में है नहीं।1कपड़े से लेकर किताबें भी तय स्थान से 1तमाम दावों के इतर वर्तमान शिक्षा सत्र में भी प्राइवेट स्कूल प्रबंधन अपने निर्धारित दुकान से ही बच्चों के किताब व ड्रेस की खरीद करवा रहे हैं। आलम यह है कि उनके तय दुकान से ही बच्चों के शूज व टाई तक खरीदने के सख्त निर्देश हैं। हर साल किताबों का पैटर्न भी बदल दिया जाता है, जिसके कारण अभिभावकों को आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है। इतना कुछ होने के बावजूद सक्षम अधिकारी कुछ करने व बोलने से कतरा रहे हैं। अभिभावक पुनीत, विनोद, संतोष ने कहा कि नई सरकार से बहुत उम्मीदें थी, लेकिन यह अब हवा-हवाई ही साबित हो रहा है। नोटबंदी के दौरान भी प्राइवेट स्कूलों पर नकेल कसने की बात कही गई थी लेकिन इस पर कुछ नहीं किया गया।


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