जागरण संवाददाता, सोनभद्र : शिक्षकों की पदोन्नति का मामला हो या फिर शिक्षामित्रों के समायोजन का अथवा नई नियुक्ति का ही मामला क्यों न हो। सूबे के आखिरी छोर पर स्थित इस जिले में शिक्षा विभाग के अधिकारी हर तरह के खेल में माहिर हैं। यानि ये किसी न किसी तरह के खेल में लगे हैं और उधर मनमाना तरीके से संचालित हो रहे पब्लिक व प्राइवेट स्कूल अभिभावकों की जेब ढीली करके उनका बजट फेल करने पर तुले हुए हैं। लाडले को अच्छी शिक्षा देने की चाहत में ये भोले-भाले अभिभावक संबंधित स्कूल के संचालकों के खिलाफ आवाज तक नहीं उठा पाते। इसका फायदा उठाकर ऐसे स्कूलों में हर साल दस फीसद तक फीस वृद्धि कर दी जाती है। इस पर किसी भी स्तर से कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 1नया शैक्षिक सत्र आते ही जिले में व्यवसायी रूपी शिक्षा का बाजार गर्म हो गया है। कहीं स्कूलों में कमीशन सेट करके स्टेशनरी के सामान आपूर्ति की जा रही है तो कहीं मनमाना तरीके से फीस वसूली जा रही है। संबंधित विभाग के अधिकारी शायद सबकुछ जानकर भी मौन हैं क्योंकि वे भी अपने किसी और खेल में लगे हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में चल रही मनमानी से दु:खी लोगों की मानें तो अधिकारी तो ट्रांसफर और पो¨स्टग तथा नियुक्तियों में ही खेल करने में जुटे हैं। पब्लिक स्कूलों के संचालक इन्हें मोटी रकम देकर अपनी मनमानी चलाते हैं। इसका असर अभिभावकों पर पड़ता है। मोटी रकम लेकर जिम्मेदार लोग मौन साध लेते हैं और पब्लिक स्कूलों के संचालकों की मनमानी शुरू हो जाती है। कैसे चलता है कमीशनखोरी का खेल1सोनभद्र : प्राइवेट व पब्लिक स्कूलों में ज्यादातर स्कूल ऐसे हैं जो अभिभावकों से मोटी रकम किसी न किसी तरह वसूल लेते हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक स्टेशनरी के दुकानदार ने बताया कि स्कूल में पहले ही बात कर ली जाती है कि जितनी बिक्री होगी उस हिसाब से कुछ फीसद उन्हें दिया जाएगा। अब बाकी काम संबंधित स्कूल के प्रबंधक या प्रधानाचार्य का होता है। ये अपने स्कूल में यह तय करते हैं कि फला विषय की किताब फला प्रकाशन की और लेखक की ही होनी चाहिए, और वह किताब उसी दुकान पर मिलती है जहां उनका कमीशन सेट होता है। इसी तरह कपड़े को लेकर भी है। किसी खास रंग के कपड़े में एक स्टीकर मात्र लगा देने से उस कपड़े का रेट बाजार से डेढ़ा हो जाता है। यानि उसमें भी कमीशन सेट होता है। 1फीस के नाम पर काटते हैं जेब1सोनभद्र : पब्लिक और प्राइवेट स्कूलों के संचालक अभिभावकों की जेब फीस के नाम काटते हैं। कई अभिभावकों ने बताया कि उनसे जेनरेटर खर्च के नाम पर, ट्यूशन फीस के नाम पर, लैब खर्च के नाम पर, स्कूल के मरम्मत के नाम पर, पढ़ाई के नाम पर व कुछ अन्य मदों में रुपये लिए जाते हैं। वह भी इस औसत में लिया जाता है कि स्कूल के संचालक मोटा मुनाफा कमाने में कामयाब होते हैं। कई बार तो विरोध करने पर बच्चों को स्कूल से निकालने तक की धमकी दी जाती है।प्राइवेट विद्यालयों की मनमानी की सूचना लगातार सुनने में आ रही है। जल्द ही जिलाधिकारी से इस बात पर चर्चा कर अभियान चलाया जाएगा। पेन से लेकर जूता बेचने की बात की पुष्टि होगी तो विद्यालय प्रबंधन पर कार्रवाई तय है। 1रामाश्रय, मुख्य विकास अधिकारी
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