जागरण संवाददाता, वाराणसी: शिक्षा के बाजारीकरण के साथ पारिवारिक, आर्थिक व अन्य कारणों से सर्वविद्या की राजधानी काशी में हर साल लगभग दस हजार बच्चे इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में भी प्रतिवर्ष सैकड़ों बच्चे बीच में ही पढ़ाई से पल्ला झाड़ ले रहे हैं। सर्व शिक्षा अभियान के तहत सालाना हाउस होल्ड सर्वे में इसका खुलासा भी हो चुका है। 1सर्व शिक्षा अभियान के तहत कक्षा आठ तक के परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा, पाठ्य पुस्तकें, ड्रेस और मध्याह्न् भोजन तक की व्यवस्था मुफ्त है। बावजूद इसके स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। माना जा रहा है कि तमाम ऐसे अभिभावक जिनके सामने ‘रोज कुआं खोदो-पानी पियो’ जैसी विवशता है, वह आर्थिक कारण से बच्चों को भी अपने साथ काम पर लगा दे रहे हैं। ऐसे बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। दूसरा प्रमुख कारण जनसंख्या के सापेक्ष सरकारी व अनुदानित विद्यालयों की कमी भी है। पिछले एक दशक में जिले में नए सरकारी स्कूलों की संख्या नगण्य है। निजी शिक्षा महंगी होने के कारण सामान्य विद्यार्थियों को सरस्वती दर्शन कराना उनके अभिभावकों के बूते की बात नहीं। वहीं उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की लंबी व विलंबित प्रक्रिया भी मोह भंग कर रही है। 1जागरण संवाददाता, वाराणसी: शिक्षा के बाजारीकरण के साथ पारिवारिक, आर्थिक व अन्य कारणों से सर्वविद्या की राजधानी काशी में हर साल लगभग दस हजार बच्चे इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में भी प्रतिवर्ष सैकड़ों बच्चे बीच में ही पढ़ाई से पल्ला झाड़ ले रहे हैं। सर्व शिक्षा अभियान के तहत सालाना हाउस होल्ड सर्वे में इसका खुलासा भी हो चुका है। 1सर्व शिक्षा अभियान के तहत कक्षा आठ तक के परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा, पाठ्य पुस्तकें, ड्रेस और मध्याह्न् भोजन तक की व्यवस्था मुफ्त है। बावजूद इसके स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। माना जा रहा है कि तमाम ऐसे अभिभावक जिनके सामने ‘रोज कुआं खोदो-पानी पियो’ जैसी विवशता है, वह आर्थिक कारण से बच्चों को भी अपने साथ काम पर लगा दे रहे हैं। ऐसे बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। दूसरा प्रमुख कारण जनसंख्या के सापेक्ष सरकारी व अनुदानित विद्यालयों की कमी भी है। पिछले एक दशक में जिले में नए सरकारी स्कूलों की संख्या नगण्य है। निजी शिक्षा महंगी होने के कारण सामान्य विद्यार्थियों को सरस्वती दर्शन कराना उनके अभिभावकों के बूते की बात नहीं। वहीं उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की लंबी व विलंबित प्रक्रिया भी मोह भंग कर रही है।
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बाजारीकरण के कारण पढ़ाई को कह रहे अलविदा
जागरण संवाददाता, वाराणसी: शिक्षा के बाजारीकरण के साथ पारिवारिक, आर्थिक व अन्य कारणों से सर्वविद्या की राजधानी काशी में हर साल लगभग दस हजार बच्चे इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में भी प्रतिवर्ष सैकड़ों बच्चे बीच में ही पढ़ाई से पल्ला झाड़ ले रहे हैं। सर्व शिक्षा अभियान के तहत सालाना हाउस होल्ड सर्वे में इसका खुलासा भी हो चुका है। 1सर्व शिक्षा अभियान के तहत कक्षा आठ तक के परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा, पाठ्य पुस्तकें, ड्रेस और मध्याह्न् भोजन तक की व्यवस्था मुफ्त है। बावजूद इसके स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। माना जा रहा है कि तमाम ऐसे अभिभावक जिनके सामने ‘रोज कुआं खोदो-पानी पियो’ जैसी विवशता है, वह आर्थिक कारण से बच्चों को भी अपने साथ काम पर लगा दे रहे हैं। ऐसे बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। दूसरा प्रमुख कारण जनसंख्या के सापेक्ष सरकारी व अनुदानित विद्यालयों की कमी भी है। पिछले एक दशक में जिले में नए सरकारी स्कूलों की संख्या नगण्य है। निजी शिक्षा महंगी होने के कारण सामान्य विद्यार्थियों को सरस्वती दर्शन कराना उनके अभिभावकों के बूते की बात नहीं। वहीं उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की लंबी व विलंबित प्रक्रिया भी मोह भंग कर रही है। 1जागरण संवाददाता, वाराणसी: शिक्षा के बाजारीकरण के साथ पारिवारिक, आर्थिक व अन्य कारणों से सर्वविद्या की राजधानी काशी में हर साल लगभग दस हजार बच्चे इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में भी प्रतिवर्ष सैकड़ों बच्चे बीच में ही पढ़ाई से पल्ला झाड़ ले रहे हैं। सर्व शिक्षा अभियान के तहत सालाना हाउस होल्ड सर्वे में इसका खुलासा भी हो चुका है। 1सर्व शिक्षा अभियान के तहत कक्षा आठ तक के परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा, पाठ्य पुस्तकें, ड्रेस और मध्याह्न् भोजन तक की व्यवस्था मुफ्त है। बावजूद इसके स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। माना जा रहा है कि तमाम ऐसे अभिभावक जिनके सामने ‘रोज कुआं खोदो-पानी पियो’ जैसी विवशता है, वह आर्थिक कारण से बच्चों को भी अपने साथ काम पर लगा दे रहे हैं। ऐसे बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। दूसरा प्रमुख कारण जनसंख्या के सापेक्ष सरकारी व अनुदानित विद्यालयों की कमी भी है। पिछले एक दशक में जिले में नए सरकारी स्कूलों की संख्या नगण्य है। निजी शिक्षा महंगी होने के कारण सामान्य विद्यार्थियों को सरस्वती दर्शन कराना उनके अभिभावकों के बूते की बात नहीं। वहीं उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति व शुल्क प्रतिपूर्ति की लंबी व विलंबित प्रक्रिया भी मोह भंग कर रही है।
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